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शुक्रवार, 5 नवंबर 2021

गोवर्धन पूजा : Govardhan puja

 गोवर्धन पर्व (Govardhan puja) की आप सभी पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं व बधाई।

गोवर्धन पूजा : Govardhan puja
फोटो: द थार डेजर्ट फोटोग्राफी


यह किसानी पर्व धीरे-धीरे भौतिकी चकाचौंध में गोरक्षण व संरक्षण के मिथक प्रचार तक सीमित होता जा रहा है। 

हमारे पूर्वजों के जीवन से जुड़े! खेती व पशुधन पालन अब केवल आय के‌ जरिये तक सिकुड़ कर रह गए हैं। हमारी पर्यावरण संरक्षण को प्रोत्साहित करती प्रेरक परम्परा जिसमें कच्चे घर पंच दिवसीय दीपोत्सव पर्व के अवसर पर गोबरधन से लीपकर तैयार होते, धान के कच्चे कोठार ( गोबर से तैयार), सुंदर रंगोली से सज्जे आंगन, दीवार और घर की महत्वपूर्ण जगह पर गोबर के साथ धान, काचर-मतीरे और फसल पकने की खुशी में दीप रखकर जलाना, संध्याकाल की पवित्र वेला में गोधन को दीपक दिखाकर सींगों पर तेल लगाकर घर परिवार में हमेशा धीणा-धापे और अन्न-धन की कामना करना हमारी सुदृढ़ परंपरा रही है। यह परंपरा केवल खुद और परिवार तक का ही सीमित नहीं है बल्कि अन्न-धन व धीणे-धापे की कामना के अंदर आए-गए से लेकर संसार के समस्त जीवों के भरण-पोषण की कामना सम्मिलित होती रही है।


वर्तमान में कंक्रीट के खड़े होते जंगल के मध्य मंगल की कामना व्यर्थ ही है। गोधन की महत्ता भी व्यवसाय तक सीमित हो गई है। और खेती बाड़ी से जुड़े सभी कार्य यांत्रिक उपकरण पर निर्भर होने के कारण गोधन की हालत चिंतनीय है। 

द्वापर में श्री कृष्ण भगवान ने गोवर्धन पर्वत उठाकर मुसलाधार वर्षा से वहां के लोगों व पशुधन को बचाया और कलयुग में गो पालन व संरक्षण का संदेश हमें मध्य सदी के महान संत सद्गुरु जांभोजी की वाणी में मिलता है। इस पावन पर्व को मनाने का यही भाव हमारा रहा है साथ ही किसानी कौम में हर्सोल्लास का यह पर्व जीवन के व्यवहार से जुड़ा हुआ है जो श्री कृष्ण भगवान व गुरु जाम्भोजी द्वारा दिए संदेश उनकी मनोवृति से जुड़ने का परिष्कृत रूप है।

सदियों से चली आ रही वसुधैव कुटुंब की भावना जो मनुष्य तक ही सीमित नहीं है बल्कि संसार की समस्त जीव-जंतुओं व पशुधन के कल्याण से परिपूर्ण है आइए इस पावन पर्व पर हम पुनः संकल्पित होकर अपने पूर्वजों की परंपरा का निर्वहन करने का प्रयास करें। 


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